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| आंख हमारे शरीर का सबसे नाजुक अंग है |
आंख में काफी ज्यादा पानी डालने से या साफ कपड़े का किनारा या भीगी हुई रूई डालने से प्रायः धूल या रेत को आप निकाल सकते हैं ।
जब कोई चीज या धूल आंख की ऊपर वाली पुतली के नीचे हो तो आंख पर पतली - सी डंडी रखते हुए उस परं पुतली को मोड़कर उसकी तलाश करें ।
यदि कोशिश करने पर भी वह कण आंख से न निकले तो आंख में प्रतिजीवाणु मलहम डालें , आंख को कपड़े से ढकें और तुरन्त डाक्टरी सहायता लें ।
आंख में घुसा हुआ कण प्रायः पुतली के किनारे पर बने छोटे छोटे खांचों में होता है । उस कण को कपड़े के किनारे से निकाल दें । आंखों का रसायनोंं से जल जाना :बैटरी का अम्ल अथवा कीटाणुनाशक दवाएं आंखों के लिए खतरनाक हो सकती हैं ।
तुरन्त आंखों पर ढेर सारा साफ पानी डालें । लगभग 30 मिनट तक पानी डालते रहें या जब तक कि जलन न रूक जाए । दूसरी आंख में पानी न जाने दें ।
लाल और पीड़ादायक आंखें - विभिन्न कारण हो सकते हैं:
लाल , पाड़ादायक आंखों के कई कारण होते हैं । इस तालिका से आपको कारण जानने में मदद मिलेगी ;
आंख में बाहरी पदार्थ ( धूल , मिट्टी के अंश आदि ) ।
अक्सर एक ही आंख पर प्रभाव डालता है ; आंख की लाली और पीड़ा भिन्न - भिन्न हो सकती है ।
जलना या आंख में हानिकारण द्रव्य पड़ना
एक या दोनों आंखों में ; आंख की लाली और पीड़ा भिन्न भिन्न हो सकती है ।
' गुलाबी आंख ' ( नेत्र - श्लेष्मा शोथ ) परागज ज्वर ( एलर्जी नेत्र - श्लेष्मा शोथ ) रोहे खसरा
प्रायः दोनों आंखों पर प्रभाव पड़ता है ( एक आंख से शुरू हो सकता है या एक आंख में ज्यादा प्रभाव हो सकता है ) आमतौर पर बाहरी किनारों पर एकदम लाली । ' जलन वाली पीड़ा , आमतौर पर थोड़ी - थोडी
गंभीर सबलबाय आइराइटिस स्वच्छमंडल पर खरोंच या घाव
प्रायः एक ही आंख पर प्रभाव पड़ता है , स्वच्छमंडल के पास ज्यादा लाली अक्सर काफी ज्यादा पीड़ा
'गुलाबी आंखें' (कंजक्टिवाइटिस)
लाल , पीड़ादायक आंखों का सही उपचार प्रायः उनका कारण पता लगाने पर निर्भर करता है । हर संभावना के लक्षण की सावधानीपूवर्क जांच करना सुनिश्चित करें । । इस छूत से एक या दोनों आंखों में लाली , पीप और हल्की ' जलन होती है । सुबह जब व्यक्ति सोकर उठता है तो उसकी आंखों की दोनों पुतलियां आपस में चिपकी होती हैं ।
उपचार :
सबसे पहले उबले हुए पानी से भीगे कपड़े से आंखों की पीप साफ करें । तब आंखों में एंटीबायोटिक नेत्र मलहम लगाएं । निचली पलक को नीचे खीचें और उसके अंदर थोड़ी मलहम डालें, और ध्यान रहे ।
आंखों के बाहर मलहम लगाने से कोई फायदा नहीं होता ।
निवारण :
ज्यादातर कंजक्टिवाइटिस बहुत संक्रामक होते हैं । संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैलता है । गुलाबी आंख वाले बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ खेलने या सोने न दें अथवा एक ही तौलिया इस्तेमाल न करें । आंखों से हाथ लगने पर हाथों को धोंये ।
यदि संभव हो काले चश्मे का इस्तेमाल करें । रोग को फैलने से रोकने के लिए नहर या तालाब में नहाने से बचें ।
रोहे (ट्रैकोमा) Trachoma
रोहे रोग नेत्र - श्लेष्माशोथ का ही दीर्घकालीन रूप है जो लगातार गम्भीर स्थिति में पहुंचता जाता है । यह महीनों या सालों तक भी रह सकता है । यदि इसका शुरू में ही इलाज न किया जाये तो कई बार इस से दृष्टिहीनता भी हो सकती है । यह रोग छूने से या मक्खियों से फैलता है और विशेष रूप से उन जगहों पर होता है जहां भीड़ हो और रहने की जगह स्वास्थ्य - प्रद न हो ।
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| रोहे एक आंखों की बीमारी |
लक्षण :
- रोहे रोग की शुरूआत भी साधारण नेत्र - श्लेष्माशोथ की तरह ही शुरू होता है अर्थात् यानी आंखों की लाली और पानी बहने के साथ ।
- लगभग एक महीने के बाद आंखों की ऊपर वाली पुतलियों के अन्दर छोटी - छोटी गुलाबी रंग की गिल्टियां बन जाती हैं जिन्हें रोमकूप कहते हैं । इनको देखने के लिए पलक को मोड़ें ।
- आंख के सफेद हिस्से में थोड़ी सी लाली और जलन होती है ।
- यदि आप ध्यानपूर्वक या आवर्धक - लैंस से देखें तो स्वच्छमंडल का ऊपरी किनारा सलेटी रंग सा दिखाई देता है क्योंकि वहां कई छोटी - छोटी नई रक्त - वाहिकाएं होती हैं ( पैनुस ) ।
- रोमकूप और पैनुस , दोनों ही हों तो यह रोग बेशक रोहे ही होता है ।
- कई सालों के बाद रोमकूप अपने आप गायब हो जाते हैं और पुतलियों के अन्दर सफेद रंग के धब्बे छोड़ जाते हैं ।
रोहों का उपचारः
आंखों में एक माह तक दिन में तीन बार 2 प्रतिशत टेट्रासाइक्लीन नेत्र - मलहम डालें । पूरे इलाज के लिए 10 दिनों से 2 सप्ताह तक टेट्रासाइक्लीन की गोलियां या सल्फोनामाइड की गोलियां मुंह से भी खायें ।
बचाव :
रोहों का पूरा और शीघ्र उपचार किया जाये तो यह रोग दूसरे लोगों में नहीं फैल पाता । ऐसे लोग और विशेष रूप से बच्चे जो रोहों के रोगी के साथ रहते हैं , उन्हें अक्सर अपनी आंखों की जांच करवाते रहना चाहिए और रोहों का कोई भी लक्षण दिखाई देते ही तुरन्त उपचार करना चाहिए । इसके अलावा , स्वच्छता के नियमों का पालन करना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है ।
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